छत्तीसगढ़ में पवन का नाम सुनते ही 36 इंच का सीना 72 का होता है…

छत्तीसगढ़

रायपुर। छत्तीसगढ़ का गांधी पवन दीवान को यूं ही कहा नहीं जाता इसके पीछे उनकी शिक्षा-दीक्षा और संस्कार भी रहे हैं। जाहिर है एक नाम के शिष्यों का नाम जुबा में आए और दोनों अपने क्षेत्रों में काबिल होने पर शिक्षक को गर्व महसूस होता है। राजिम निवासी पवन पौराणिक ने संत कवि पवन दीवान के बीते लम्हों को याद करते हुए बताया कि वह पढ़ाई में उनसे 2 साल जूनियर रहे थे ।जब वह दुर्गा महाविद्यालय रायपुर में नियमित बी . कॉम फाइनल में पढ़ रहे थे । तभी दीवान एम. ए अंग्रेजी प्रथम वर्ष की प्राइवेट परीक्षा दिलाने पहुंचे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात कॉलेज के गेट पर हुई थी। हालांकि उनसे कोई पहली मुलाकात नहीं थी। पवन पौराणिक राजिम के रहने वाले थे तो वही पवन दीवान का परिवार भी राजिम में था। इसी वजह से उनके और पवन दीवान के बीच अच्छे संबंध थे। इसका एक और कारण यह भी राहा की पवन दीवान और पौराणिक साहित्यिक क्षेत्र में अग्रसर होने कारण दोनों के बीच अच्छा तालमेल था । जब कभी साहित्य या धार्मिक आयोजन होता तो इसी बहाने दोनों पवन कि मुलाकात हो जाती । श्री पौराणिक ने बताया कि एक बार जब उन्होंने पवन दीवान से पूछा अभी करते क्या हो तो फिर इशारे में श्री दीवान ने सील मोहर को दिखाया उसमें लिखा था प्राचार्य। उस समय वह राजिम के संस्कृत विद्यालय में प्राचार्य थे। खास बात यह भी रहा कि भले ही दोनों एक दूसरे के सीनियर जूनियर रहे हो लेकिन मजे की बात यह है कि दोनों को एक ही शिक्षक ने पढ़ाया। पवन पौराणिक ने बताया कि उनके शिक्षक ईश्वरीय प्रसाद गर्व से कहते थे छत्तीसगढ़ में दो पवन हैं जिनका नाम सुनते ही सीना 36 से 72 का हो जाता है एक पवन दीवान और पवन पौराणिक ।

बिम्ब हिन्दी पत्रिका के संपादक : पवन दीवान 1964-65 में बिम्ब हिन्दी मासिक पत्रिका के संपादक रहें थे। पत्रिका का प्रकाशन बिम्ब हिन्दी साहित्य समिति करती थीं। यह काव्य संग्रह था, जिसमें हर महीने नए संपादक बनते थे। पत्रिका में पवन पौराणिक की कविता ,इस कड़कती धूप में छांव तलाश किया करता हूं इस घनघोर यमनी में मै सुबह की आस लिए फिरता हूं अतीत स्मृति की चिता में दिन रात जला करता हूं इसीलिए पुरानी बातो को भूलने का प्रयास किया करता हूं,प्रकाशित हुई थीं।

पवन पौराणिक

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