गांव के रास्ते उम्मीद बांधती पाठशाला

छत्तीसगढ़


देश के दूर-दराज के अंचलों से शिक्षा में बदलाव के लिए कार्य करने वाले सरकारी स्कूलों की कहानियां पर पुस्तक यह आपको महाराष्ट्र, गोवा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक स्कूलों की यादगार कहानियों से रूबरू कराती है। युवा पत्रकार और अध्येता शिरीष खरे ने दूरदराज की बीहड़ यात्राओं से इन कहानियों को जुटाया है। प्रख्यात शिक्षा शास्त्री प्रोफेसर अनिल सदगोपाल लिखते हैं, शिरीष खरे की यह पुस्तक नई रोशनी लेकर आई है। लेखक ने पांच राज्यों के दूरदराज के इलाकों में सरकारी स्कूलों के बेहतरीकरण के लिए शिक्षकों, पालकों, समुदायों व पंचायतों द्वारा की गई पहलकदमियों की प्रेरणादायक कहानियां दर्ज की हैं। ये कहानियां, बदलाव की तीन अहम संभावनाओं को उजागर करती हैं। पहला, सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सभी तबकों के बच्चों के लिए बेहतरीन करना मुमकिन है। दूसरा, बहुजन (आदिवासी, दलित, ओबीसी, मुस्लिम, विमुक्त व घुमन्तू जाति) बच्चे कभी भी ‘ड्रॉप-आऊटÓ नहीं होते वरन् पूरी स्कूली व्यवस्था और माहौल के द्वारा वे ‘पुश-आऊटÓ या बेदखल किए जाते हैं। तीसरा, यह मिथक है कि प्रायवेट स्कूल बेहतर होते हैं और सरकारी स्कूल घटिया। जब स्कूलों में बदलाव लाए गए तो न केवल पालकों ने बच्चों को प्रायवेट स्कूलों से निकालकर सरकारी स्कूलों में भेजा लेकिन बहुजनों के बेदखल किए गए बच्चे-बच्चियां भी स्कूल आने लगे यानी पूरे गांव या इलाके का सरकारी स्कूल पर भरोसा लौट आया। इसकी भूमिका जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता वल्लभाचार्य ने लिखी है।

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