बच्चे जिंदगी ढूंढते गंदगी व कबाड़ के बीच …

छत्तीसगढ़

by।अविनाश वाधवा


तिल्दा नेवरा | हाथ में कॉपी कलम की जगह कचरे के ढेर में भविष्य तलाशते बच्चे अपनी प्रारंभिक शिक्षा से दूर होते जा रहें है | ऐसे बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए वैसे तो राज्य शासन द्वारा कई योजनाएं चलाईं जा रही है, लेकिन इन दृश्यों को देखने के बाद ऐसा लगता है कि यह योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही सिमट कर रह गई है। कुछ ऐसा ही नजारा तिल्दा नेवरा में भी देखने को भी मिल जाता है जहां 25-30 ऐसे बच्चे हैं जो आज शिक्षा की मुख्यधारा से कोसों दूर हैं और गंदगी व कबाड़ के बीच अपनी जिंदगी ढूंढते नजर आते हैं। ये बच्चे रद्दी में मुख्य रूप से दवाइयों की शीशियाँ, शराब की बोतलें, प्लास्टिक एवं दूध की थैलियाँ आदि एकत्रित करते रहते हैं। और इकट्ठा किये सामानों को लेकर ये बच्चे कबाड़ी वालों के पास जाते हैं और कबाड़ी वाले कुछ पैसे देकर कुछ सामान खरीद लेते हैं । यह पैसा न्यूनतम मजदूरी के समान भी नहीं होता है। बावजूद जोखिम लेकर कूड़े के ढेर से दो रोटी की जुगाड़ करने में मशगूल रहते हैं ये । उन्हें इस बात का आभास भी नहीं रहता है कि रद्दी बंटोरने के दौरान वे रोगों को भी आमंत्रित कर रहे हैं । लगातार बढ़ रहे संक्रामक रोगों के परिदृश्य में उक्त बच्चों के बीमारी की चपेट में आने की अधिक आशंका रहती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इन बच्चों की ओर शासन-प्रशासन के साथ-साथ नगर की सामाजिक सस्थाओं की नजर अब तक नहीं पड़ी है जिससे उनके उत्थान के लिए कोई सार्थक कदम उठाया जा सकें |
जीवन ही कचरे के ढेर पर टिका है
समाज में एक ऐसा भी वर्ग है जिनका जीवन ही कचरे के ढेर पर टिका है। यानी कि कूड़े के ढेर पर ही वह अपनी रोटी की जुगाड़ में लगा होता है। कूड़े की ढेर पर जिदंगी से जूझते और बीमारियों की खुली चुनौती कबूलते ये बच्चे आज अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे है। सूरज की पहली किरण के साथ पीठ पर प्लास्टिक का थैला या बोरा लिये निकल पड़ने वाले इन बच्चों के स्वास्थ्य या सुरक्षा की गारंटी कोई लेने को कोई तैयार नहीं।

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