प्रज्ञा द्विवेदी की कलम से…

एजुकेशन जज्बा

“सफ़र में धूप तो होगी”

एक घटना ने पिछले सात महीनों से हिला कर रखा हुआ है ,इस पर लिखने में इतनी देर इसलिए की मरने वाले के बाद उसके परिवार की स्थिति और परिवर्तन देखना चाहती थी।
सात माह पहले जान पहचान के एक परिवार की फूल सी लड़की ने अचानक आत्महत्या कर ली।
उसके इस निर्णय से करीब पांच दिन पहले मेरी उससे रास्ते मे संक्षिप्त मुलाकात भी हुई थी, और मेरी छठी इन्द्रिय ने कुछ संकेत भी दिए जो ट्रैफिक की आवाज़ और दूसरी औपचारिकताओं में दब गए।

अगर जीवन रिवाइंड किया जा सकता तो हममे से शायद हर व्यक्ति को लगे कि फलां फलां जगह मेरा निर्णय ग़लत था,मैं उसे बदलना चाहता/चाहती।
मुझे भी लगता है उस शाम वो लड़की कुछ बुझी सी मिली।पांच दिनों बाद आत्महत्या कर ली।वो शाम वापस आती तो उसे पूछती ,कि क्या बात हैं,क्यो उदास हो?शायद कुछ मदद कर पाती।पता नही उसे क्या दिक़्क़त थी ,पर इतना पता है ऐसी कोई दिक्कत थी,जिसके हज़ार इलाज थे।

एक बात का भरोसा हमेशा से रहा कि कितनी भी विकट परिस्थिति हो अगर सरस्वती दिमाग मे या जिह्वा पर ,हृदय में, कहीं भी उपस्थित हों तो उस परिस्थिति से सकुशल निकला जा सकता है,और मेरे जीवन मे ऐसे ढेरों अनुभव हुए भी हैं।
पता नही क्यो,उससे बात नही हुई और वो चल बसी।बाद में सौ तरह की बातें हुईं,ये हुआ होगा ऐसा रहा होगा। अटकलों में हम सुपर सोनिक जहाज़ से भी आगे हैं।
मुझे एक बात उसके चेहरे से लगी,जब मिली बहुत परेशान, उदास थी…उसे बात करने की ज़रूरत थी,किसी ऐसे साथी की जो उसकी दिक्कतों(चाहे वो कैसी भी थीं) को सुलझाने में मदद न भी कर पाता तो इतना तो कहता कि”दुनियाँ खत्म नहीं हुई,रास्ते हज़ार हैं”।
ये बहुत बड़ी लाइन है,आपके किसी अपने ने आपको छोड़ दिया, कोई अनायास चल बसा, इमोशनल रिश्तों में टूटन आई, आपको परीक्षा में असफलता मिली,आप लंबे समय से अस्वस्थ हैं,कोई आपकी कमज़ोरियों पर आपको ब्लैकमेल कर रहा है।इसका उपाय “मरना “नहीं हैं। ये प्रसङ्ग उन सभी युवाओं के लिए हैं,जिन्हें ये लगता है”अब कुछ नही हो सकता,सब खत्म”।

असफलता कभी न कभी हर व्यक्ति ने अपने जीवन मे भोगी हुई हैं,हर कोई आत्महत्या का रुख नही करता। ज़ाहिर हैं ऐसे लोग मानसिक रूप से कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं।परिस्थितियों से भागना उपाय नही हैं,लड़ना उपाय हैं।
माँ सरस्वती पर इतना भरोसा हैं कि ,किसी दिन ऐसे आत्मघाती इरादों वाला कोई मिल जाये तो शायद वाणी के मरहम से ,अपने शब्दों से ,उसका निर्णय बदल दूँ।इसलिए ये लेख आज लिख रही शायद किसी के काम आ जाये,कोई ज़िंदगी बच जाए।

आत्महत्या करने वाली उस लड़की के परिवार की आज की स्थिति बताऊं। लड़की की माँ जिसने कि उसे जन्म दिया वो सैकड़ो दिन रोई, धीरे धीरे उसने ये सच स्वीकार कर लिया,अब आप समझ सकते हैं जब मां ने स्वीकार कर लिया तो औरों ने भी किया।उस लड़की से सबसे ज़्यादा घुली मिली उसकी चाची को जब मैने फोन करके हालचाल पूछा,उसने कहा”अब सच स्वीकार लिया गया हैं,मैं पहले उसके साथ बाज़ार जाती थी ,अब अकेले जाती हूँ,बहुत याद आती हैं और क्या करूँ,विकल्प तो ढूंढने होंगे “। बहरहाल परिवार अपनी पुरानी दिनचर्या पर लौट आया है।

बात कड़वी हैं ,लेकिन सच। आप जब नही होते लोग आपका विकल्प ढूंढने लगते हैं, और ये बात हर निराश युवा को समझना होगा कि लोग आपकी आत्महत्या के बाद आपका विकल्प ढूंढे इस से बेहतर आप ही कोई विकल्प ढूंढे। करियर जो चाहते थे ,नही हुआ, जीवन साथी जो चाहिए वो नही मिला,दुनियाँ विकल्पों से भरी हैं । सुनने में कटु लगता हैं,कि जिसे प्यार किया वो नही मिला,पर जीवन त्यागकर भी क्या मिला । कहते हैं समय बहुत बड़ा मरहम हैं,जल्दबाज़ी में ग़लत निर्णय लेकर जीवन खोने से बेहतर हैं,घावों को समय दिया जाए,कोई न कोई मरहम मिल ही जाता हैं।

लड़कियों से कहूँगी, भावनात्मक रिश्ते,एक उम्र में जुड़ ही जाते हैं ,इसमे दो तरह की दिक्कतें आती हैं,एक तो ब्रेक अप दूसरा, कोई ऐसी गलती जिसे करके आप ग्लानि महसूस कर रहे हों । ब्रेक अप से उबरना हो तो भीड़ में रहें,सँगीत सुने, गायें, मनोरंजन के लिए जो कुछ भला लगे वो करें।
किसी गलती की वजह से अगर जान देने की इच्छा हैं तो एक पल को ये सोचें ,कि क्या ये इस ब्रह्माण्ड की पहली गलती हैं जो सिर्फ मुझसे हुई हैं । ज़ाहिर हैं सैकड़ों लोगों से गलतियाँ हो जाती होंगी,सब मरते नहीं, जीकर ऊपर उठते हैं।अगर खुद को माफ करने की ताकत हो तो, “लोग क्या कहेंगे” ये प्रश्न नही उठता।
समय के साथ लोग भी आपकी गलतियों को मानवीय भूल स्वीकार कर लेते हैं। और ये सच भी हैं ,मानवीय भूल होना ज़िंदगी का हिस्सा हैं ,लेकिन इसका मतलब ये भी नही कि जानबूझ कर गलतियाँ की जाएं।
अब तो जीना नामुमकिन हैं ,ऐसा सोचने वाले युवा एक बार अगर किसी विश्वासपात्र से चर्चा करें तो समझ जाएंगे की जीवन कहीं रुकता नही सिर्फ दिशा बदलता हैं। आप भी सिर्फ दिशा बदलें,करियर की, प्रेम की, सोच की, मन की।

परीक्षाओं का समय हैं ,परिणाम ज़ाहिर हैं मेहनत के अनुरूप आएंगे, लेकिन हर बार परीक्षा के बाद आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती है। विद्यार्थियों के पास दो विकल्प है या तो जी तोड़ मेहनत कर मनचाहा लक्ष्य पा लें, दूसरा ये कि, किसी भी कारणवश ये सम्भव नही होता तो अपने पास प्लान भी ज़रूर रखें। कम प्रतिशत आने या फेल होने का इलाज आत्महत्या नहीं हैं । इसका सीधा अर्थ हैं ज़िंदगी आपसे कुछ और मांग रही हैं । शायद, ज़्यादा बेहतर……।

और एक सबसे ज़रूरी बात ,कि बच्चा अपने रिश्तों में हार गया हो या परीक्षा / करियर में।घरवालों काउसके साथ होना निहायत ही ज़रूरी हैं।बच्चे के उदास व्यवहार को, असामान्य व्यवहार को पहचानें, उसे उलाहना न देकर उसे एहसास करवाएं, की दुनियाँ खत्म नहीं हुई बल्कि आज से एक नई जिंदगी शुरू हुई जिसमें हम साथ हैं । उसे सिखाएं कि कोई लक्ष्य सरल नहीं होता न ही उसका कोई आसान रास्ता होता हैं । निदा फ़ाज़ली जी की एक ग़ज़ल बड़ी प्रिय है मुझे-सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो। और बच्चों से…” इस जहाँ में आपके अस्तित्व के दो विकल्प है , आत्महत्या या पुर्नजीवन। मौत के बाद कुछ नही है,लेकिन कुछ हारने के बाद पुनर्जीवन के भीतर हज़ारों विकल्प हैं”।

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