ज्योति कुर्रे की कलम से….

जज्बा

ये कविता उन दिनों की याद में है,जब मैं career को लेके बहुत परेशान थी…
✍🏻वो नाकामयाबी का दरिया मुझे बुला रही थी,
पल-पल और बस हर पल मुझे डूबा रही थी,
क्या चीज है तू, और औकात ही क्या तेरी,
ये कहकर हर कदम पे मुझे आजमा रही थी,,
तू चला जा और बस चला जा ये कह कर मेरी हिम्मत को जगा रही थी,
पर, “हाँ” वो नाकामयाबी का दरिया मुझे अब भी बुला रही थी,,
खुद भी समझी और और उसे भी समझा रही थी,
तू कर सकती है और तू करेगी ये कह कर उसे भी मना रही थी,
हुनर है! तुझमें कुछ कर गुजरने का बस, यही उसे बता रही थी,
पर, “हाँ” वो नाकामयाबी का दरिया मुझे अब भी बुला रही थी,,
आसान नहीं था रास्ता मगर वो आसान बना रही थी,
चलना उसे आता है! बस रास्ता खुद को दिखा रही थी,
इन आँखों से उन सपनों की मंजिल अब साफ नगर आ रही थी,
पर, “हाँ” वो नाकामयाबी का दरिया मुझे अब भी बुला रही थी,,
चल कर कुछ कदम थक जाएगी तू, ये कहकर मेरा हौसला गिरा रही थी,
आ अब लौट आ ये सोच मेरी कमजोरी मुझे वापस बुला रही थी,
पर मैंने ठानी और हार न मानी,बस लड़ी ये अल्फ़ाज़ गुनगुना रही थी,,
पर, “हाँ” वो नाकामयाबी का दरिया मुझे अब भी बुला रही थी,,
फिर क्या हुआ सवेरा,छटा अंधेरा हालात मुस्कुरा रही थी,
आज खड़ी है अपने दम पे, ज्योति ये सबको बता रही थी,
चाहो अगर तो क्या नही होता,बस ये किस्सा सुना रही थी,,…
पर, “हाँ” वो नाकामयाबी का दरिया मुझे अब भी और आज भी बुला रही थी…..

नोट : प्रकाशित लेख लेखकों द्वारा लिखी गई है इसमें किसी भी प्रकार की
प्रतिलिप्यधिकार के दावे की स्तिथि में लेखक स्वयं जिम्वेदार होगा |

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