छिन्द के पत्ते से बनी राखियां आकर्षण का केन्द्र

छत्तीसगढ़

By. ज्योति कुमार कमलासन

बस्तर की कला मे विविध नवाचार देखने को मिलता है. बहुआयामी विधाओ को समेटे हुए बस्तर की कला मे अनेको रंग समाहित है. यहाँ की ढोकरा कला और काष्ठ कला मे निर्मित कलाकृतियों ने पुरे दुनिया मे बस्तर का डंका बजाया है.

यहाँ के आदिवासियो के हाथो मे प्रकृति प्रदत्त हुनर कुछ इस तरह से समाया हुआ है कि उनकी बनाई कलाकृति पुरी दुनिया मे सुर्खियाँ तो बटोरती ही है साथ ही प्रकृति को स्वस्थ रखने का सार्थक संदेश भी देती है. यहाँ बहुतायत मे पाये जाने वाले छिन्द पेड़ के पत्ते से भी नित नये कलाकृतियो का सृजन होता है.

शादी ब्याह मे दुल्हे के मुकुट के रुप से छिन्द पत्ते से बना मुकुट पहना जाता है. वही अब दंतेवाडा मे भाई बहन के पवित्र त्यौहार रक्षाबन्धन हेतु राखियां भी छिन्द पत्ते से तैयार होने लगी है.

दन्तेवाडा के झोडियाबाडम निवासी अनिल ने अब छिन्द के पत्ते से राखियां बनाई है जो कि आजकल आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है. अनिल भले ही दिव्याँग है किन्तु भगवान ने उसे बेहद अनोखा हुनर दिया है जो लोगों के लिये प्रेरणादायी है. छिन्द पत्ते से बनी राखियाँ पर्यावरण हितैषी भी है वहीं भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा मे बेहद ही प्रशंसनीय प्रयास है.

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