पोला  पर्व: लोक जीवन  और अच्छी फसल  की  पूजा

By. शिवचरण सिन्हा

दुर्गुकोंडल 17 अगस्त भाद्रपद अमावस्या को मनाया जाने वाला पोला पर्व का अंचल में विशेष महत्व है खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस पर्व को पूरे श्रद्धा भाव से मनाया जाता है. पोला फसल व पशुधन पूजा का पर्व है स्थानी बोली मे इसे पोरा कहा जाता है. इस दिन लड़के बैल सजाकर पूजा अर्चना करते हैं लड़कियों के मिट्टी के छोटे-छोटे खिलौने से खेलते हैं सुफा मिट्टी की बर्तनों में अपना भोजन बनाएंगे जीवन करेंगे यही खेल की भावना होती है गांव के सभी लोग होते हैं जहां महिलाएं सुआ कर्मा ददरिया नृत्य करते हैं तथा बच्चे खेलते हैं.

पोला पर्व को लेकर बाजार में रौनक

पोला पर्व को लेकर 18 अगस्त को अंचल में पोला का त्यौहार को देखते हुए सप्ताहिक बाजार दुर्गुकोंडल शुक्रवार को बाजार में अच्छी रौनक रही . नदी बैल पोरा चुकी को दुकानों में भीड़भाड़ रही गांव गांव से पहुंचे कुम्हारो ने बाजार में दुकानें लगाई और कीमत ₹40 से लेकर ₹60 तक नदी बैल बिका. इस प्रकार से पोला के अन्य सामान भी बिकने लगे इसके अलावा पोला के अन्य सामग्री सुपा जाता कढ़ाई जो मिट्टी से बना अन्य सामग्री परंपरागत रूप से बच्चों के खिलौने के रूप में उपयोग करते हैं. यह परंपरागत रूप से त्यौहार पशुपालन फसल एवं पशुधन पूजन का महापर्व पोला पर्व है जिसे लोग श्रद्धा से मनाते है।

किसानों का प्रमुख पर्व


सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष श्री राम बघेल कृषक शिवलाल कोमरे हीरूराम उयके

धर्म सिंह मंडावी पति राम नरेटी प्रदीप कुमार ने बताया है कि पोला त्यौहार यहा सदियों से मनाते आ रहे हैं. यह सदियों पुरानी परंपरा है जिसे वे पूरे उत्साह से मनाते हैं. पोला पर्व तक किसान खेती के काम निपटा चुके होते हैं पोला के दिन सुबह से ही पूरा परिवार नए कपड़े पहन कर काश की थाली में मिट्टी के बर्तन को सजाते हैं. उनके सम्मुख सभी देवी देवताओं को रखा जाता है थाली में रखकर पूजा करते हैं बैल को लक्ष्मी जी का प्रतीक मानकर उनकी पूजा अर्चना करते हैं और अच्छी फसल की विनती करते हैं. इस दिन किसान कृषि काम हेतु हल बैल नहीं ले जाते सुबह से दोपहर तक पूजा अर्चना करते हैं पूजा करने के बाद गांव में भजन रामायण व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम लोकनृत्य ददरिया एवं परंपरागत रूप से संस्कृति के
अनुसार सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।

पोला पर्व की मान्यता

पोला पर्व के मान्यता लेकर गोंडवाना समाज दुर्गुकोंडल के ब्लॉक सचिव एवं ग्राम गायता बैजनाथ नरेटी
ने बताया कि पर्व के 1 दिन पूर्व गांव का गायता पुजारी उपवास करते हैं शाम को सभी बुजुर्ग प्रमुख श्यान शीतला मंदिर में एकत्रित होकर गांव स्थित भैसासुर किसान जाते हैं. मान्यता है कि इस स्थान पर प्राचीन काल में जिंदा भैंस को दफनाया जाता था. यहां आज भी स्त्रियों का जाना वर्जित है दिन के 12:00 बजे यहां कोई नहीं जाता है. पोला पर्व में इस स्थान पर मध्यरात्रि भैसासुर की पूजा की जाती है. पूजा में जिंदा भैंस के स्थान पर मोर के पंख और पैर दफनाए जाते हैं इसको कहते हैं गर्भ देना कहा जाता है इसके बाद ही धान तथा अन्य फसल गर्भधारण करते हैं ।

तीजा के पहले नंदी पूजा

हिंदू धर्म के अनुसार एवं परंपरागत रूप से पोला के दूसरे दिन महिलाएं कड़वा भोजन
जिसे कढ़वा भात कहते हैं. पंडित हेमंन प्रसाद मिश्रा ने बताया है कि चतुर्थ मास में किसान खेती काम से निवृत्त हो जाते हैं. इस त्यौहार तक उनको बुवाई रोपाई निदाई ज काम पूर्ण हो जाता है. इस दिन विशेष रूप से लक्ष्मी जी का पूजन करते हैं किसान विशेषकर बैंलो के माध्यम से ही खेती का कार्य करते हैं. इसीलिए उन्हें लक्ष्मी जी का प्रतीक मानकर पूजा पूजन करते हैं. महिलाओं के लिए यहां तीजा पव विशेष महत्व रखता है क्योंकि पोला के तीसरे दिन हुए तीजा उपवास करती हैं नदी को शंकर जी का वाहन नंदी माना जाता है तीजा का उपावास महिलाएं ही रखती हैं. तीजा का उपवास से पहले नंदी जी की पूजा करके इसका पूजा करती है. छत्तीसगढ़ में तीजा पर्व का विशेष महत्व है महिलाएं शिव पार्वती का निर्जला व्रत महिलाएं रहती है और अपने अपने मायके में तीजा पर्व में पूजा करने की परंपरा है.
वहीं इस बार देश दुनिया में महामारी कोरोनावायरस के चलते तीजा पर्व पर उत्साह कम दिख रही है क्यों बस टैक्सी वहां नहीं चलने से महिलाओं को आने जाने में दिक्कत हो रही है साथ ही महामारी को लेकर लोगों में काफी दहशत है जिसे देखें इस वर्ष तीजा पर्व पर असर देखने को मिलेगा ।

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