गणेश उत्‍सव की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने किया

By. शिवचरण सिन्हा

कांकेर. दुर्गुकोंदल :-गणेशोत्सव बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों को एकजुट करने के लिए आयोजित किया था जो कि धीरे-धीरे पूरे राष्ट्र में मनाया जाने लगा है।
धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार श्री वेद व्यास ने गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेश को लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे श्री गणेश ने अक्षरश: लिखा था।10 दिन बाद जब वेद व्यास ने आंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद श्री गणेश का तापमान बहुत अधिक हो गया है। तुरंत वेद व्यास ने श्री गणेश को निकट के सरोवर में ले जाकर ठंडा किया था। इसलिए गणेश स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है।

गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ


इसी कथा में यह भी वर्णित है कि गणपति जी के शरीर का तापमान ना बढ़े इसलिए वेद व्यास ने उनके शरीर पर सुगंधित सौंधी माटी का लेप किया। यह लेप सूखने पर श्री गणेश के शरीर में अकड़न आ गई। माटी झरने भी लगी। तब उन्हें शीतल सरोवर में ले जाकर पानी में उतारा। इस बीच वेदव्यास ने 10 दिनों तक श्री गणेश को मनपसंद आहार अर्पित किए तभी से प्रतीकात्मक रूप से श्री गणेश प्रतिमा का स्थापन और विसर्जन किया जाता है और 10 दिनों तक उन्हें सुस्वादु आहार चढ़ाने की भी प्रथा है। उक्त कथा का सार पंडित एमन प्रसाद मिश्र के अनुसार विसर्जन का नियम इसलिए है कि मनुष्य यह समझ ले कि संसार एक चक्र के रूप में चलता है भूमि पर जिसमें भी प्राण आया है वह प्राणी अपने स्थान को फिर लौटकर जाएगा और फिर समय आने पर पृथ्वी पर लौट आएगा। विसर्जन का अर्थ है मोह से मुक्ति, आपके अंदर जो मोह है उसे विसर्जित कर दीजिए। आप बप्पा की मूर्ति को बहुत प्रेम से घर लाते हैं उनकी छवि से मोहित होते हैं लेकिन उन्हें जाना होता है इसलिए मोह को उनके साथ विदा कर दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि बप्पा फिर लौटकर आएं, इसलिए कहते हैं गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।

महाराष्‍ट्र से गणेश उत्‍सव का आरंभ किया गया


भारतीय इतिहास के पन्‍नों में यह दर्ज है कि महाराष्‍ट्र में गणेश उत्‍सव की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने की थी। उन्‍होंने यह परंपरा अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देश को एकजुट करने के लिए की थी। उन्‍हें यह अच्‍छे से पता था कि भारतीय आस्‍था के नाम पर एकजुट हो सकते हैं। इसलिए उन्‍होंने महाराष्‍ट्र से गणेश उत्‍सव का आरंभ किया और फिर वहां गणेश विसर्जन भी किया जाने लगा।सभी देवी-देवताओं का विसर्जन जल में होता है। जल को नारायण रूप माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है संसार में जितनी मूर्तियां इनमें देवी-देवता और प्राणी शामिल हैं, उन सभी में मैं ही हूं और अंत में सभी को मुझमें ही मिलना है। जल में मूर्ति विसर्जन से यह माना जाता है कि जल में घुलकर परमात्मा अपने मूल स्वरूप से मिल गए। यह परमात्मा के एकाकार होने का प्रतीक भी है। जल का संबंध ज्ञान और बुद्धि से भी माना गया है जिसके कारक स्वयं भगवान गणेश हैं। जल में विसर्जित होकर भगवान गणेश साकार से निराकार रूप में घुल जाते हैं। जल को पंच तत्वों में से एक तत्व माना गया है जिनमें घुलकर प्राण प्रतिष्ठा से स्थापित गणेश की मूर्ति पंच तत्वों में सामहित होकर अपने मूल स्वरूप में मिल जाती है।

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