श्राद्ध पक्ष, शनिदेव  वाहक, कौआ का महत्व और बस्तर अंचल का  पितृ पक्ष…

By.. शिवचरण सिन्हा

दुर्गूकोंदल – इन दिनों देश दुनिया के साथ बस्तर अंचल के गांवों में भी जोर शोर से श्राद्ध पक्ष मनाया जा रहा है.. इस पक्ष में कौओं का विशेष महत्व है। माना जाता है कि ये पितरों के संदेश वाहक होते हैं। इसलिये इन्हें कराया गया भोजन सूक्ष्म रूप से पितरों तक पहुंचता है और उन्हें संतुष्टि मिलती है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि कौआ एक मात्र ऐसा पक्षी है जो पितृ दूत कहलाता है।


पंडित हेमंन प्रसाद मिश्रा नहीं बताया है कि पितृपक्ष के दौरान सभी लोग अपने घर आंगन में चांवल आटे से रंगोली बनाकर उस पर पीढ़ा का आसन में फूल सजाकर एक लोटा जल, दातुन आदि रख कर अपने अपने पितर को न्योता देकर अपने घर आंमत्रित करते हैं। कंडे में अग्नि जलाकर दुबी के सहारे जल, गुड़, उड़द दाल, गुलाल आदि समर्पित करते हैं। साथ ही अपने पितृदेव की पूजा कर तोरई पत्ते पर मुख्यत,उड़द दाल की बड़ा, तुराई की सब्जी के अलावा खीर, पुड़ी परोसते हैंl
कौआ यमस्वरूप है। वह यमराज का पुत्र एवं शनिदेव का वाहक है। उसके आदेश से देह त्यागने के बाद लोग स्वर्ग और नरक में जाते हैं। मान्यता है कि पृथ्वी पर जब तक यमराज रहेंगे तब तक कौआ का विनाश नहीं हो सकता है। अगर किसी वजह से कौओं का सर्वनाश हो जाता है काक बलि की जगह गौ ग्रास देकर पितरों की प्रसन्नता की जा सकती है। गौ माता को धर्म का प्रतीक माना जाता है। धर्म प्रतीक के दिव्य होने पर पितरों की प्रसन्नता के लिए सार्थक माना जाता है। पित्र पक्ष में अपने पूर्वजों को तिथि के अनुसार पूजन अर्चन कर लोगों को भोजन कराया जाता है वही परिवार के बुजुर्गों माता-पिता भाई-बहन को अलग-अलग तिथि के अनुसार पितृपक्ष को मनाया जाता है वही पित्र पक्ष के 15 दिन तक इसी प्रकार से धार्मिक कार्य एवं शुभ कार्य नहीं किए जाते इसके अलावा अंतिम तिथि में पित्र मोक्ष के नाम से विदाई कार्यक्रम परिवार में लोगों के द्वारा की जाती है. और यहां श्राद्ध का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है जिसे श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है जो कि परंपरागत रूप से यहां हिंदू संस्कृति का विशेष पर्व के रूप में जाना जाता है.

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