महिला दिवस पर कवियित्री प्रज्ञा त्रिवेदी की कलम से…

जज्बा

मत दो एक “दिवस”, उसकी शख्सियत को
सर्जक है वह,उसे ख़ुद को भी गढ़ने दो।

लौटा सको तो लौटाओ उसका मान,
अपना आसमान खुद तय करने दो।

बन सको तो चट्टान सी, ताक़त बनो उसकी,
उसे, तरल सी,निर्बाध ,संग-संग बहने दो।

छोड़ सको तो छोड़ो तुम चिर विजयी होने का ख़िताब ,
उसे भी महानता का कंटीला ताज मत दो ।

मत पूजो उसे,वो पत्थर नही,ज़िंदगी है।
ठोकरें मारकर,उसकी नज़र से ख़ुद को न गिरने दो।

रखो भरोसा,उसकी “प्रज्ञा” पर ,रचने दो इतिहास।
माँ, बेटी और सहचरी को अब शक्ति भी बनने दो।

मत बनो उसके निर्णायक,सृजने दो व्यक्तित्व उसे।
न देवी, न दासी ,उसे बस इंसान रहकर जीने दो।।।

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