वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्तओं ने पंचायती राज मंत्री से की मुलाकात



नई दिल्ली-8 जुलाई। 73वे संविधान संशोधन अधिनियनम-1992 के अधीन 1996 मे बने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों मे विस्तार) अधिनियम, जिसे पेसा क़ानून भी कहा जाता है, को 25 वर्ष बीतने के बाद भी अभी तक पूरी तरह से लागू नही किया गया। पाँचवी अनुसूची के 10 राज्यों; महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आँध्र प्रदेश, तेलंगाना, हि.प्र; म.प्र; छ.ग; झारखंड व उड़ीसा में से आख़िरी 4 राज्यों ने तो इस क़ानून के नियम भी अभी तक नही बनाए हैं। इस कारण इन 4 राज्य के जनजाति लोग तो इसके लाभ से अभी तक वंचित हैं।


इस बारे में हुए वनवासी कल्याण आश्रम ने केंद्र सरकार से माँग की है इस क़ानून के रजत जयंति वर्ष मे सभी 10 राज्यों से मिलकर, उनको निर्देश देकर मिशन मोड में इसे लागू किया जाए। कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डाक्टर एच. के. नागू के नेतृत्व में गत 6 जुलाई को पंचायती राज मंत्री श्री नरेंद्र सिहं तोमर से उनके कार्यालय में मिले प्रतिनिधि मंडल ने यह माँग की थी। मुलाक़ात व चर्चा के समय केंद्रीय पंचायत सचिव सुनील कुमार भी उपस्थित रहे। इस शिष्ट मंडल में व.क.आश्रम के संयुक्त महामंत्री विष्णु कांत-दिल्ली, जनजाति हितरक्षा प्रमुख गिरीश कुबेर-हैदराबाद और कालूसिंह मुजाल्दा-इंदौर भी सम्मिलित थे।


इस क़ानून ने जनजातियों को ग्रामसभा के जरिये अपने गाँव में शासन-प्रशासन की स्वायत्तता दी है, लघु-खनिज व लघु जल-स्त्रोतों के प्रबंधन और उपयोग तथा लघु-वनोपजों पर मालिकाना हक़ दिया है। इस क़ानून ने सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का चयन, बजट के उपयोग का प्रमाणन, नशाबंदी पर रोक या उसे विनियमित करने, अपने परस्पर के छोटे झगडें परम्परागत ढंग से निपटाने, अपनी संस्कृति के संरक्षण, साहूकारी व्यवसाय-ब्याजखोरी पर नियंत्रण, स्थानीय हाट-बाज़ारों के प्रबंधन, भूमि हस्तांतरण जैसे 29 विषयों का अधिकार निचली पंचायत – ग्रामसभाओं को दिये हैं। पर इन राज्यों ने राजस्व गाँवों को ही पेसा गाँव घोषित कर दिया जबकि इस क़ानून मे टोला, पाडा या बस्तियों को अलग पेसा गाँव घोषित करना होता है।

ग्रामसभाओं को पंचायत कोष में से निश्चित राशि स्थानीय विकास हेतु देने का नियम है परंतु इन्हें कोई धनराशि उपलब्ध नही कराई जाती।
वास्तव में तो गांधीजी के ग्राम स्वराज और दीनदयालजी के अंत्योदय के सपनों को साकार करने के लिये इस क़ानून का प्रभावी उपयोग हो सकता है पर राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव व लाल फ़ीताशाही के कारण इसका क्रियान्वयन नही हो पाया। महाराष्ट्र ने अवश्य इसमें कुछ पहल की है।


यह माँग भी की गई कि केंद्र को इन 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों व राज्यपालों का अलग सम्मेलन बुलाकर इसके रास्ते में आ रही बाधाओं को दूर करना चाहिये। जैसी प्रतिबद्धता वन व जनजाति मंत्रालय ने गत दिनों एक संयुक्त परिपत्र जारी कर वनाधिकार क़ानून को लागू करके प्रकट की है वैसा ही संयुक्त परिपत्र इसे लागू करने के लिये भी जारी किया जाए।
मंत्री ने सभी बातें गंभीरता से सुनी और सिद्धांतरूप से इन सभी बातों पर सहमति व्यक्त करते हुए अपने मंत्रालय को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिये।

NEWS27_REPORTER

http://news27.org

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *