30 अगस्त को कृष्ण जन्माष्टमी जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र अष्टमी तिथि भी पड़ेगा

By।शिवचरण सिन्हा

दुर्गुकोंडल 29 अगस्त 2021।श्री कृष्ण का जन्मोत्सव भाद्रपद की कृष्‍ण अष्टमी को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस बार 30 अगस्त दिन सोमवार को देर रात 01 बजकर 59 मिनट पर यह पर्व मनाया जाएगा। इस बार श्रीकृष्ण का 5248 वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। राम, महावीर और बुध एक रंगी है परंतु श्रीकृष्ण बहुरंगी है। इसीलिए वे पूर्णावतार हैं। राम ने ही श्रीकृष्‍ण के रूप में लिया था जन्म। जन्माष्टमी त्योहार मनाने एवं पूजा का शुभ मुहूर्त पंडित हेमंन प्रसाद मिश्रा के अनुसार अष्टमी तिथि 29 अगस्त रात 11. 25 अष्टमी तिथि समाप्त 31 अगस्त को सुबह 1:59 बजे तक रहेगी रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ 30 अगस्त को सुबह 6:39 पर होगा और रोहिणी नक्षत्र 31 अगस्त को सुबह 9:44 पर समाप्त होगाआइये जानते हैं उनके संबंध में 36 रोचक तथ्‍य।

शरीर की विशेषता

भगवान श्री कृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था, काला या सांवला नहीं।
. भगवान श्री कृष्ण के शरीर से एक मादक गंध निकलती थी। जिसे युद्ध काल में छुपाने का वे हर समय प्रयत्न करते रहते थे
भगवान् श्री कृष्ण के परमधामगमन के समय ना तो उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्री थीं।
भगवान श्री कृष्ण की मांसपेशियां मृदु परंतु युद्ध के समय विस्तॄत हो जातीं थीं, इसलिए सामान्यतः लड़कियों के समान दिखने वाला उनका लावण्यमय शरीर युद्ध के समय अत्यंत कठोर दिखाई देने लगता था ठीक ऐसे ही लक्ष्ण कर्ण व द्रौपदी के शरीर में देखने को मिलते थे।*
भगवान श्रीकृष्ण के केश घुंघराले थे और उनकी आंखों बड़ी-बड़ी मोहक थी।
तन पर पीले वस्‍त्र और सिर पर मोर मुकुट धारण किए, गले में बैजयंती माला और हाथों में बांसुरी लिए उनका रूप मनोरम नजर आता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार सखियों के नाम इस तरह हैं- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा। कुछ जगह ये नाम इस प्रकार हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और सुदेवी। कुछ जगह पर ललिता, विशाखा, चम्पकलता, चित्रादेवी, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और कृत्रिमा (मनेली)। इनमें से कुछ नामों में अंतर है।*
*कृष्ण की 3 बहनें थीं- एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं), सुभद्रा और द्रौपदी (मानस भगिनी)। कृष्ण के भाइयों में नेमिनाथ, बलराम और गद थे।
श्रीकृष्‍ण के माता पिता वसुदेव और देवकी थे, परंतु उनके पालक माता पिता नंदबाबा और माता यशोदा थीं। श्रीकृष्‍ण ने इन्हीं के साथ अपनी सभी सौतेली माता रोहिणी आदि सभी के सात बराबरी का रिश्ता रखा।
श्रीकृष्‍ण की बुआ कुंती और सुतासुभा थी। कुंती के पुत्र पांडव थे तो सुतासुभा का पुत्र शिशुपाल था।
. भगवान् श्री कृष्ण अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी द्वारिका में 6 महीने से अधिक नहीं रहे।
. भगवान् श्री कृष्ण ने 2 नगरों की स्थापना की थी द्वारिका (पूर्व में कुशावती) और पांडव पुत्रों के द्वारा इंद्रप्रस्थ (पूर्व में खांडवप्रस्थ)।
भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में आध्यात्मिकता की वैज्ञानिक व्याख्या दी, जो मानवता के लिए आशा का सबसे बड़ा संदेश थी, है और सदैव रहेगी।
भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के अलावा अनुगीता, उद्धव गीता के रूप में भी गीता का ज्ञान दिया था।
पौराणिक मान्यताओं अनुसार प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।
श्रीकृष्‍ण के संबंधी
भगवान् श्री कृष्ण की परदादी ‘मारिषा’ व सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) ‘नाग’ जनजाति की थीं।
भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।
*भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा सहित राधा की अष्ट सखियां भी थीं। अष्टसखियों के नाम हैं- 1. ललिता, 2. विशाखा, 3. चित्रा, 4. इंदुलेखा, 5. चंपकलता, 6. रंगदेवी, 7. तुंगविद्या और 8. सुदेवी।
श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थीं- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।
भगवान श्रीकृष्ण के कई बाल सखा थे। जैसे मधुमंगल, सुबाहु, सुबल, भद्र, सुभद्र, मणिभद्र, भोज, तोककृष्ण, वरूथप, श्रीदामा, सुदामा, मधुकंड, विशाल, रसाल, मकरन्‍द, सदानन्द, चन्द्रहास, बकुल, शारद और बुद्धिप्रकाश आदि। उद्धव और अर्जुन बाद में सखा बने। बलराम उनके बड़े भाई थे और सखा भी।

भगवान श्री कृष्ण ने अपनी औपचारिक शिक्षा उज्जैन के संदीपनी आश्रम में मात्र कुछ महीनों में पूरी कर ली थी। जहां उन्होंने 16 विद्या और 64 कलाओं को सीखा था।
जनसामान्य में यह भ्रांति स्थापित है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे, परंतु वास्तव में कृष्ण इस विधा में भी सर्वश्रेष्ठ थे और ऐसा सिद्ध हुआ मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में जिसकी प्रतियोगिता द्रौपदी स्वयंवर के ही समान परंतु और कठिन थी। यहां कर्ण व अर्जुन दोंनों असफल हो गए और तब श्री कॄष्ण ने लक्ष्यवेध कर लक्ष्मणा की इच्छा पूरी की, जो पहले से ही उन्हें अपना पति मान चुकीं थीं।
भगवान् श्री कृष्ण के खड्ग का नाम नंदक, गदा का नाम कौमौदकी और शंख का नाम पांचजन्य था जो गुलाबी रंग का था।
. भगवान् श्री कृष्ण के धनुष का नाम शारंग व मुख्य आयुध चक्र का नाम सुदर्शन था। वह लौकिक, दिव्यास्त्र व देवास्त्र तीनों रूपों में कार्य कर सकता था उसकी बराबरी के विध्वंसक केवल दो अस्त्र और थे पाशुपतास्त्र ( शिव, कॄष्ण और अर्जुन के पास थे) और प्रस्वपास्त्र ( शिव, वसुगण, भीष्म और कृष्ण के पास थे)।*
*प्रचलित अनुश्रुतियों के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास का आरंभ भी उन्हीं ने किया था।
कलारीपट्टु का प्रथम आचार्य कृष्ण को माना जाता है। इसी कारण नारायणी सेना भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी। भगवान् श्री कृष्ण ने कलारिपट्टू की नींव रखी जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई।
*भगवान श्रीकृष्ण के रथ का नाम जैत्र था और उनके सारथी का नाम दारुक/ बाहुक था। उनके घोड़ों (अश्वों) के नाम थे शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक।
*भगवान् श्री युद्ध कृष्ण ने कई अभियान और युद्धों का संचालन किया था, परंतु इनमे तीन सर्वाधिक भयंकर थे। 1- महाभारत, 2- जरासंध और कालयवन के विरुद्ध 3- नरकासुर के विरुद्ध
भगवान् श्री कृष्ण ने केवल 16 वर्ष की आयु में विश्वप्रसिद्ध चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया। मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया।
भगवान् श्री कृष्ण ने असम में बाणासुर से युद्ध के समय भगवान शिव से युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्णव ज्वर का प्रयोग कर विश्व का प्रथम जीवाणु युद्ध किया था। बहन सुभद्रा का विवाह कृष्ण ने अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से किया था। उसी तरह श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र साम्ब का विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से किया था।
श्रीकृष्ण ने अपने भांजे अभिमन्यु को शिक्षा दी थी और उन्होंने ही उसके पुत्र की गर्भ में रक्षा की थी।
भगवान श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनी थे। उनका आश्रम अवंतिका (उज्जैन) में था। इसके अलावा उनके गुरु गर्ग ऋषि, घोर अंगिरस, नेमिनाथ, वेदव्यास आदि थे। यह भी कहा जाता है कि जैन परंपरा के मुताबिक, भगवान श्री कॄष्ण के चचेरे भाई तीर्थंकर नेमिनाथ थे जो हिंदू परंपरा में घोर अंगिरस के नाम से प्रसिद्ध हैं।
. द्रौपदी से श्रीकृष्ण का अनूठा रिश्‍ता था। श्रीकृष्‍ण दौप्रदी को अपनी बहन समान ही मानते थे। दोनों का संबंध प्रगाढ़ था।

NEWS27_REPORTER

http://news27.org

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *