दुर्गुकोंदल में  पोरा तिहार मनाया

By।शिवचरण सिन्हा

दुर्गुकोंदल। किसी भी राज्य की सार्थक पहचान उनकी संस्कृति से होती है। जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य ,भारत देश का एक मात्र ऐसा राज्य है जो पूर्णतः कृषि प्रधान राज्य है। यहां के निवासी पूरे वर्ष भर खेती कार्य में लगे रहते है। धान की खेती यहां की प्रमुख फसल है। छत्तीसगढ़ का प्रमुख व प्रथम त्यौहार हरेली के ठीक एक माह बाद भादो के अमावस में पोरा तिहार मनाया जाता है। धान के कटोरा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ में यहां के रहवासी पोरा त्यौहार को परम्परागत त्यौहार के रूप में मनाते आ रहे हैं।
इसी क्रम में दुर्गुकोंदल क्षेत्र के किसान अपने गौमाता व बैलों को नहलाने के बाद उनके सींग व खूर में पेंट या पॉलिश लगाकर कई प्रकार से सजाये, गले में घुंघरू, घंटी या कौड़ी से बने आभूषण पहनाये तथा पूजा कर आरती उतारे।साथ ही मिट्टी के बने नांदी व जाता – पोरा का पूजन कर इस खिलौने के माध्यम से छोटे बच्चों को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों व पारम्परिक शिक्षा का आधार मानकर बालको को बैल, खेती बाड़ी की जिम्मेदारी का और बालिकाओं को चूल्हा चौका घर सम्हालने की जिम्मेदारी का सिख देता है। अर्थात मिट्टी के खिलौने के माध्यम से बच्चों को पारम्परिक जिम्मेदारियों की शिक्षा पोरा त्यौहार का प्रमुख उद्देश्य है। पोरा त्यौहार धान के कटोरा छत्तीसगढ़ में बच्चे से लेकर बूढ़े और किसान सभी को अपनी जिम्मेदारियां और खुशहाली का संदेश देती है।दुर्गुकोंदल बाज़ार हटवारा में नन्हे-नन्हे बच्चे अपने मिट्टी के बने नंदी का दौड़,बच्चियों ने सहेलियां के साथ जाता-पोरा खेलकर खुशियां बांटी।
इस पर्व को छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, हिमाचलप्रदेश, उत्तराखंड, असम, सिक्किम तथा पड़ोसी देश नेपाल में भी मनाया जाता है। वहां इसे कुशोत्पाटिनी या कुशग्रहणी अमावस्या, अघोरा चतुर्दशी व स्थानीय भाषा मे डगयाली के नाम से मनाया जाता है।

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