वेदांत से ही साकार होगा “एक भारत-विजयी भारत” का सपना

रायपुर। राष्ट्र के चरित्र निर्माण के लिए सतत प्रयासरत विवेकानंद केंद्र के छत्तीसगढ़ प्रांत प्रभाग ने यहां पंचदिवसीय कार्यशाला आयोजित कर अनेक विषयों पर विचार मंथन किया। कार्यशाला की शुरुआत अधिवक्ताओं के समागम से हुई जिसमें वक्ताओं के विचारों से निष्कर्ष निकला कि वेदांत से ही “एक भारत-विजयी भारत” का सपना साकार होगा। अधिवक्ताओं को समर्पित पहले दिन की कार्यशाला में प्रांत प्रमुख भंवर सिंह राजपूत ने कन्याकुमारी स्थित शिला स्मारक पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक भारत के मानस निर्माता स्वामी विवेकानंद ने 1893 में अमेरिका में जो अभूतपूर्व भाषण दिया था, उससे समकालीन विश्व को वेदांत के बारे में पता चला। वेदांत विश्व बंधुत्व और प्राणियों के कल्याण की बात करता है। श्री राजपूत ने यह भी बताया कि भारत ने 1962 के चीन युद्ध में क्या-क्या खोया और उसे पुनः प्राप्त करने के लिए वेदांत के माध्यम से “एक भारत-विजयी भारत” की क्या प्रासंगिकता है।

कार्यशाला का दूसरा दिन चिकित्सकों को समर्पित था। इस अवसर पर विवेकानंद केंद्र द्वारा संचालित बी.ओ.आर.एल. अस्पताल-बीना के संचालक श्री कैलाश चारुकर ने बताया कि शिला स्मारक के निर्माण के लिए किस तरह शक्ति संग्रह किया गया। उन्होंने बताया कि डॉ. संजय मेहता और श्री बालासाहब देवरस ने कैसे स्मारक निर्माण की बाधाएं दूर की और वेदांत के प्रतीक के रूप में इस स्मारक की स्थापना का सपना साकार हुआ, जो आज राष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए एक अमूल्य धरोहर है। कार्यशाला के तीसरे दिन खुदरा व्यापारियों को समर्पित कार्यक्रम में कर्नल (अवकाशप्राप्त) वाई.एस. दुबे ने विस्तार से “एक भारत-विजयी भारत” का अर्थ बताया। उन्होंने कहा कि विचार भिन्नता मानव का स्वभाव है लेकिन “एक भारत-विजयी भारत” का सपना साकार करने के लिए विभिन्न विचारों में एकरूपता लाना आवश्यक है। यही वो मंत्र है जिसके बल पर हम श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर सकेंगे। इस अवसर पर जाने-माने शल्य चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. पुष्कल द्विवेदी ने स्वस्थ भारत के विचार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसे साकार करने के लिए संकल्पित प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

कार्यशाला का चौथा दिन शिक्षकों को समर्पित रहा। इस अवसर पर विवेकानंद केंद्र के कर्मठ एवं समर्पित कार्यकर्ता श्री हेमंत चटर्जी ने कहा कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ विचार का वास होता है और उसी से विजयी भारत के संकल्प का प्रादुर्भाव होता है। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने 1897 में तीन भविष्यवाणियां की थीं – पहली भविष्य वाणी थी कि अगले 50 वर्ष के भीतर ही भारत स्वतंत्र होगा, दूसरी यह कि पूरा एशिया महादेश भी स्वतंत्र हो जाएगा और तीसरी यह कि उसके बाद भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर होगा। आज जैसी परिस्थितियां बन रही हैं, उसमें भारत पूरी मानवता को नेतृत्व देने की स्थिति में आ गया है, ऐसा परिदृश्य साफ परिलक्षित हो रहा है।

कार्यशाला का पांचवां और अंतिम दिन उद्योग-व्यापार बंधुओं को समर्पित रहा। इस अवसर पर ओजस्वी और कर्मठ कार्यकर्ता श्री मनोहर देव ने कहा कि उद्योग सामाजिक उत्थान के लिए अतिआवश्यक होने के साथ-साथ पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करते हैं। उन्होंने हर्ष के साथ बताया कि विजयी भारत का सपना साकार करने में भारतीय उद्योग सक्षम हैं। हमें अपने उद्यम और परिश्रम से भारत को विश्व का अग्रणी निर्माण केंद्र बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना है।इस दिन कार्यशाला का मंच संचालन सुयश शुक्ल ने किया।

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