दुर्गूकोंदल:  खंडीघाट में  बहादुर कलारिन की स्मृतियां

by।शिवचरण सिन्हा

दुर्गूकोंदल। दुर्गूकोंदल से 12 किमी दूर ग्राम चेमल के पास खंडीघाट में माता बहादुर कलारिन की स्मृतियां के अवशेष आज भी मौजूद हैं। यहां शराब बनाने का बर्तन नुमा पत्थर मौजूद हैं, जिसके संरक्षण की जरुरत है। खंडीघाट से लगा हुआ प्राचीनकाल में भैजरगढ़ नगर था जिसके अवशेष आज भी मौजुद है। यहीं पर कलार समाज की बहादुर कलारिन की देशी कच्ची शराब बनानेे के पत्थर के बर्तन अवशेष के रुप में है।

     पुरातन काल में जाति वर्ग के अनुसार व्यवसाय किया जाता था। कलार जाति का पारंपरिक व्यवसाय शराब बनाकर बेचने का था। शराब के बदले रुपये पैसे के अलावा चांवल आदि लेते थे। ग्राम गुदुम निवासी बुजुर्ग जलसिंह के अनुसार करीब 80-90 वर्ष पूर्व तक शराब की डोंगी के पास एक बोतल और सवा रुपए रख देने से बोतल अपने आप भर जाती थी। इस चमत्कार को साक्षात देखने वाले बुजुर्ग आज भी गवाह हैं। पत्थर की डांेगी आज भी मौजूद है। खंडीघाट में स्थित बहादुर कलारिन की स्मृतियां आज भी विद्यमान है। अशोक जैन ने बताया कि समाज के युवा अपनी प्राचीन स्मृतियों को भूलते जा रहे हैं, जरुरत है शासन प्रशासन इन्हें संरक्षित करे।

कौन थी बहादुर कलारिन

     प्राचीन काल में जमींदारी प्रथा के समय बहादुर कलारिन जिनका वास्तविक नाम कलावती था। इनके माता-पिता की मौत बचपन में ही हो गई थी। समाज के प्रमुख कांशीराम नेवेंन्द्र ने बताया कि कलावती का लालन-पालन उनके बडे़ पिता सुबेलाल कलार ने किया जो खारुन नदी से लेकर कोटरी नदी तक के जमींदार थे। कलावती ने अपने जमींदारी का विस्तार बारसूर के सातधार तक किया। इसी बहादुरी के कारण इनका नाम बहादुर कलारिन से जाने जाना लगा। विवाह अमरकंटक से बारंगल तक राज करने वाले राजा छाच्छान से हुआ। इनके एक पुत्र छाच्छान छाडू हुए जिनकी स्मृतियां बालोद इलाके के सोरर क्षेत्र में भी है।

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