दुर्गुकोंदल:स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इन्द्रू केवट की 56वी जयंती मनाया

By।शिवचरण सिन्हा

दुर्गुकोंदल।स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इन्द्रू केवट की 56वी जयंती 22अक्टूबर शुक्रवार को सुरउँगदोह में निषाद समाज के सामाजिक अध्यक्षो,ग्रामीणों व जनप्रतिनिधियों की गौरवमय उपस्थिति में मनाया गया।
विदित हो कि इन्द्रू निषाद की कहानी वर्तमान बस्तर संभाग के उत्तरी क्षेत्र से जुडी है जो कभी कांकेर रियासत का हिस्सा हुआ करता था। अविश्वसनीय किंतु सत्य है कि दुर्गूकोंदल से 10 किमी दूर सुरउँगदोह जैसे छोटे से गाँव के निवासी इन्द्रू केवट ने महात्मा गाँधी के सत्याग्रही मार्ग को जीवन में उतार लिया तथा वे इस आदिवासी अंचल में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के सूत्रधार बने। साधारण सी धोती और हाँथ में डण्डा यही उनका वेश और सामान था जिसके सहारे वे गाँव गाँव घूमते तथा गाँधी के आदर्शों व स्वतंत्रता की आवश्यकता जैसी बातों से ग्रामीणों को परिचित कराया करते थे। 1933 में जब महात्मा गाँधी दुर्ग थे। उस समय यह निर्धन, आदिवासी सत्याग्रही नंगे पांव अपनी लाठी टेकता हुआ पैदल ही निकल पडा।आदिवासी अंचल के सत्याग्रही इन्द्रू केवट की मुलाकात जब महात्मा गाँधी से हुई और वे उनके समर्पण भाव तथा ओजस्विता को देख कर अत्यधिक प्रभावित हुए । गाँधी जी से हुई इस मुलाकात के बाद इन्द्रू केवट बस्तर के गाँव-गाँव घूम कर आदिवासी समाज को स्वतंत्रता के मायने समझाने लगे।
इन्द्रू केवट के कारण ही कांकेर रियासत ने राष्ट्रीय राजनीति का अर्थ जाना और तिरंगे से परिचित हुए। वर्ष 1944-45 की बात है जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों को धन, लकडी, अनाज आदि की आवश्यकता पडी। ऐसे में बस्तर और कांकेर रियासतें मुख्य रूप से उनके द्वारा शोषित हुईं। आदिवासी किसानों से कम दाम में खरीद कर लगभग अट्ठारह हजार मन धान और पच्चीस हजार रुपये राजस्व के रूप में वसूला गया था। वर्ष 1945 में नयी भू-राजस्व वयवस्था के तहत अनेक गाँवों को जोडा गया और हंटर के बल पर किसानों से उनकी फसल छीनी जाने लगी। इन्द्रू केवट ने तब लगान मत पटाओ का नारा दिया और राजा तथा अंग्रेजों के विरोध में जुट गये। खण्डी नदी के पास पातर बगीचा में सत्याग्रहियों की पहली बैठक हुई जिसमें पहली बार चरखा युक्त झंडा प्रतीक बना। इस बैठक में लगभग डेढ हजार आदिवासी प्रतिनिधि एकत्रित हुए थे। अहिंसक आन्दोलन जोर पकडने लगा और इसमे गुलाब हल्बा, पातर हल्बा, कंगलू कुम्हार जैसे अनेक आदिवासी उनके साथ जुडने लगे। इस आदिवासी सत्याग्रही के गतिविधियों की जानकारी जैसे ही मिली तब अंग्रेजों का दबाव राजा पर पडा और इन्द्रू केवट की गिरफ्तारी का वारंट निकाला गया। जेल से बचने के लिये इस उन्होंने बडी ही युक्ति से काम लिया। धोती ही तो एकमात्र आवरण था उनका और बाकी शरीर पर उन्होंने ‘टोरा का तेल’ मल लिया। सिपाहियों ने उन्हे पकडा जरूर लेकिन वे फिसल कर उनकी पकड से छूट निकले और भाग गये। आन्दोलन बढा तो लगभग तीन सौ गाँवों के किसान सत्याग्रही हो गये और अब पूरी ताकत राजा को लगानी पडी जिसके पश्चात इन्द्रू केवट और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पैदल ही रियासत की राजधानी कांकेर तक लाया गया। इन्द्रूकेवट और उनके 429 किसान साथियों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। अब समय सत्याग्रह की ताकत से परिचित होने का था। गाँव गाँव से लगभग दो सौ बैलगाडियों में भर कर किसान इन्द्रू केवट और उनके साथियों को छुडाने कांकेर पहुँच गये। आन्दोलन को इस तरह फैलते देख अंग्रेज सकते में आ गये और उन्होंने आन्दोलनकारियों से समझौता कर लिया। राजद्रोह के मुकदमे वापस ले लिये गये तथा इन्द्रू केवट अपने साथियों के साथ रिहा कर दिये गये।

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