By।शिवचरण सिन्हा

दुर्गुकोंदल:दिवाली की धूम चाराें तरफ देखने काे मिली। वहीं दिवाली महापर्व के चौथे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है. जिसका सभी के लिए खासा महत्व हाेता है। इसे हम अन्नकूट के नाम से भी जानते है। दिवाली के एक दिन बाद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा की जाती है. इस दिन सभी लाेग 56 भोग लगाने की परंपरा के साथ भगवान श्रीकृष्ण का पूजन भी करते है। गोवर्धन पूजा के लिए गोवर्धन पर्वत बनाने की मान्यता के साथ इस दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा भी की जाती है।गोवर्धन की परिक्रमा पूरी करने में लगभग दो दिन लग जाते हैं।इस दिन गोवर्धन पर्वत के साथ पशुधन की पूजा की जाती है। दुर्गुकोंदल क्षेत्र में 5 नवम्बर शुक्रवार को गोवर्धन पूजा बहुत धूमधाम से मनाई गई। गोवर्धन पूजा से पहले लोग अपने पशुधन को स्नान करवाते हैं। इसके बाद उनका श्रृंगार करते हैं।गाय-बैल को सजाने के बाद उनकी पूजा करने के साथ अन्नकूट का भोग समर्पित किया गया। इसमें कई तरह की सब्जियां, मिष्ठान, कड़ी, चावल, बाजरा, रोटी, पूआ, पूरी, पकौड़ी, खीर, माखन मिश्री आदि सामिग्री समर्पित की गई। आज के दिन भगवान कृष्ण की पूजा भी की जाती है। उन्हें अन्न कूट का भोग लगाया जाता है। क्षेत्र के कई जगहों पर यह पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में ब्रजवासी जब भगवान कृष्ण की बात मान कर गोवर्धन की पूजा करने को तैयार हो गए, तो इंद्र ने इसे अपना अपमान मानते हुए ब्रज में जमकर बरसात शुरू कर दी।घनघोर बारिश से ब्रजवासी त्राहि-त्राहि करने लगे।तब भगवान कृष्ण ने इंद्र का मान भंग करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कन्नी उंगली पर उठाकर सभी ब्रजवासियों को उसके नीचे खड़ा कर लिया।इंद्र देव 7 दिन तक घनघोर बारिश करते रहे, लेकिन जब वह ब्रज और ब्रजवासियों का कुछ नहीं बिगाड़ सके तो उनको अहसास हुआ कि वह साक्षात नारायण को अपना बल दिखाने की कोशिश कर रहे थे। इसके बाद इंद्र ने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी।इंद्र के मान भंग होने से खुश हुए ब्रजवासियों ने तब भगवान कृष्ण और गोवर्धन की पूजा की और उत्सव मनाया। तब से आज तक घर-घर में भगवान गोवर्धन की पूजा की जाती है।

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