By।शिवचरण सिन्हा

दुर्गुकोंदल। देवउठनी एकादशी का पर्व दुर्गुकोंदल अंचल में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। तुलसी विवाह में गन्ने का मंडप बनाने की प्रथा है जिसके कारण आज गन्ने की घर-घर खरीददारी की गई। मान्यता है कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवप्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। इसी दिन शुभ कार्य की भी शुरूआत हो जाता है। इस पारम्परिक त्यौहार में माताओ और बहने ने घर के आंगन की तुलसी चौरा की लिपाई-पोताई के साथ गन्ना आदि सामग्री से वहां आकर्षक सजावट की। घर के दरवाजे व तुलसी चौरा को आकर्षक रंगोली बना कर सजाया।तुलसी विवाह में सुहागिन महिलाएं माता तुलसी की पूजा कर अपने सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मांगी ।क्षेत्र में सनातन धर्म अनुसार पूरे विधि-विधान से माता तुलसी और भगवान शालीग्राम का विवाह कराने माता तुलसी को गमले में या तुलसी चौरा को गन्ने के मंडप बनाकर उस पर लाल चुनरी उढ़ाई गई।इसके बाद तुलसी के पौधे को साड़ी लपेटकर माता तुलसी को चूड़ी व श्रृंगार का सामान चढ़ाया गया, फिर भगवान गणेश सहित भगवान शालीग्राम और माता की पूजा गई। भगवान शालीग्राम की मूर्ति को सिंहासन पर बिठाया और फिर उस सिंहासन को हाथ में लेकर तुलसी जी की सात परिक्रमा किये, फिर धूप और दीप जलाकर उनकी आरती की गई।बच्चों व बड़ो ने शाम होने से पहले ही आतिशबाजी शुरू कर दी थी।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता तुलसी ने भगवान विष्णु को नाराज होकर श्राप दे दिया था कि तुम काला पत्थर बन जाओ। जिसके बाद इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु ने शालीग्राम पत्थर के रूप में अवतार लिया और तुलसी से विवाह किया।तभी से शालीग्राम और तुलसी के विवाह को एक त्योहार के तौर पर मनाया जाता है।माता तुलसी को माता लक्ष्मी का भी अवतार माना जाता है।

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