दुर्गूकोंदल: बस्तर संभाग स्तरीय युवा महोत्सव में हल्बा जनजातीय की महिलाओं ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया

By।शिवचरण सिन्हा

राज्य स्तरीय युवा महोत्सव के लिए हुआ चयन

दुर्गूकोंदल। बस्तर संभाग स्तरीय युवा महोत्सव में कांकेर जिले के दुर्गूकोंदल विकासखंड के आश्रित ग्राम-बांगाचार की हल्बा जनजातीय महिलाओं ने उत्कृष्ट प्रदर्शन कर कांकेर जिले को प्रथम स्थान दिलाया है। राज्य सरकार की अतिमहत्वाकांक्षी कार्यक्रम युवा महोत्सव में विभिन्न विधाओं को प्रस्तुत करने का मौका मिलता है इसी कड़ी में 13 दिसंबर को विकासखंड स्तरीय युवा महोत्सव में ग्राम-बांगाचार के हल्बा समुदाय की महिलाओं ने बेहतर प्रदर्शन कर धनकुल लोकगीत को प्रथम स्थान दिलाया था। उसके बाद 15 दिसंबर को कांकेर में आयोजित जिला स्तरीय युवा उत्सव में पुनः उत्कृष्ट प्रदर्शन कर संभाग स्तर के लिए क्वालीफाई किया था। 22 व 23 दिसंबर को शहीद गुंडाधूर कृषि महाविद्यालय,कुम्हरावण्ड जगदलपुर में आयोजित कार्यक्रम में बस्तर की पारंपरिक धनकुल लोकगीत ने परचम लहराया। कांकेर जिले के लिए यह महत्वपूर्ण सफलता है। जिसका चयन राज्य स्तरीय युवा महोत्सव के लिए हुआ है। इस उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए नोडल अधिकारी बैजनाथ नरेटी,सर्व आदिवासी समाज ब्लाक अध्यक्ष जगतराम दुग्गा, जनपद सदस्य देवलाल नरेटी,प्रदेश उपाध्यक्ष युवा प्रभाग सर्व आदिवासी समाज ललित नरेटी,बांगाचार सचिव रामप्रसाद दुग्गा,कर्रामाड़ सचिव कृपाराम बघेल, शिक्षक मुकेश बघेल, हेमलाल खरे,शिक्षक हंसाराम राना,सबलसिंह दीवान, दुखितराम खरे,भारतराम भंडारी,हृदय बघेल,नरेश बघेल आदि ने बधाई दी है।

हल्बा जनजातीय समुदाय में धनकुल का महत्व

बस्तर की प्रमुख लोकगीतों में धनकुल लोकगीत अपना अलग महत्व रखता है। हल्बा जनजातीय समुदाय की महिलाओं के द्वारा धनकुल वाद्ययंत्र बजाकर गायन किया जाता है। जिसमें दो गुरमायँ होती हैं- पाट गुरमायँ और चेली गुरमायँ। वाद्ययंत्र में दो धनुष, दो छिरनी काड़ियों,दो हाँडियों और धान फटकने के काम आने वाले दो सूपों के संयोजन से निर्मित होता है। हाँडियों को रखने के लिए कपड़े का आँयरा का उपयोग होता है। प्रायः दो मीटर लंबे धनुष के दाहिने हिस्से में लगभग डेढ़ मीटर पर तकरीबन आठ-दस इंच के हल्के खाँचे कंघी के आकार के बने होते हैं। धनुषों का एक सिरा हाँडी के मुख पर ढँके सूपा पर होता है और दूसरा सिरा नीचे जमीन पर। गुरूमायें माचियों पर बैठकर धनुष के लगभग एक तिहाई भाग के पास अपनी बाँयी टाँग के नीचे दबाकर रखती हैं और बायें हाथ की तर्जनी ऊँगली और अँगूठे से धनुष की डोरी यानि प्रत्यंचा को खींचती तथा दाहिने हाथ से खाँचे पर छिरनी काड़ी को रगड़ते हुए वादन करती हैं। इससे धनुष की टंकार, हाँडी के ऊपर रखे गये सूपों, हाँडी और छिरनी काड़ी से घुम-छर्,घुम-छर्,घुम-छर् का समवेत संगीत नि:सृत होता है।

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