दुर्गुकोंडल: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी “बीर मांझी” की गाथा

By। शिवचरण सिन्हा


दुर्गुकोंडल । अमूल्य रत्नों से परिपूर्ण जाज्वल्यमान छत्तीसगढ़ वसुन्धरा का अंचल कितना पवित्र कितना सौभाग्यशाली और कितना अनोखा है, यह किसी से छिपा नही है। यह रत्नगर्भा छत्तीसगढ़ भूमि अपने अंदर जहां असंख्य मणि मुक्ताएँ छिपाए बैठी है, वही उसके बस्तर अंचल में समय समय पर ऐसे मानव रत्न भी पैदा हुए है जिनकी जीवन ज्योति से आदिवासी समाज भी जगमगा उठा है। ऐसे विलक्षण मानव बस्तर में एक-दो नही हुए है। इनकी एक विशाल मालिक है। इसी दिव्य मालिका के एक जगमगाता रत्न है “बीरा मांझी” ।
बीरा मांझी का जन्म वर्तमान में कांकेर जिला के एक छोटे से ग्राम भीरागांव के नूरूटी परिवार में 10.01.1914 को हुआ था। उनके पिताजी का नाम सोमधर मांझी व माताजी का नाम झेला बाई था। उनके पिता अपने समय के प्रभावशाली व सम्पन्न किसान थे। तत्कालीन कांकेर राज परिवार के ओर से मांझी का दर्जा प्राप्त था एवं मालगुजारी के लिए आसपास के कुछ ग्राम दिये गए थे।

गर्भ में ही नामकरण कर दिया गया


कहते है कि माता झेलो बाई जब गर्भ में थी तभी राजा कोमल देव के द्वारा उनका नामकरण कर दिया गया था क्योकि सोमधर ने यह भविष्यवाणी कर दिया था कि आने वाला संतान पुत्र ही होगा, जिसे राजा ने स्वीकार करते हुए ग्राम भीरागांव के नाम पर बीरा नाम दिया। सोमधर मांझी के घर तीन पुत्रियों के बाद पुत्र पैदा हुआ था, सारा गांव खुश था क्योंकि उनके मांझी के धाती को सम्हालने वाला आ गया था। पांच भाई बहन में इनका कम चौथा था। आसपास कोई विद्ययालय न होने के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा नहीं हो पाया।

बीर मांझी” को महात्मा गांधी भी कहते हैं


छत्तीसगढ़ अंचल में स्वतंत्रता आंदोलन की शुरूआत 1857 की पहली कांति के साथ हुआ लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ बस्तर के आदिवासीयों ने सन 1818 में अबुझमाण इलाके में गैदसिंह के नेतृत्व में सबसे पहले विद्रोह का बिगुल फूका था, जिसका प्रभाव भीरागांव के मांझी सोमधर को पड़ा। जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने पुत्र बीरा को साहसी निडर व देश भक्त की औपचारिक शिक्षा दी।
बचपन से ही उन्हें धार्मिक शिक्षा परिवार से प्राप्त हुआ। युवा होने पर उनका विवाह ग्राम केवटी के मंगतीन बाई से सम्पन्न हुआ। जिनसे तीन पुत्रीयां व दो पुत्र प्राप्त हुए।
पिता के असमय मृत्यु होने पर मांझी का दायित्व बीरा पर आ गया। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भीरागांव से अंग्रेजी हुकमत के विरूद्ध
: अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। इनके वीरता पूर्ण कार्य करने के लिए आसपसा के जनमानस इन्हें आज भी महात्मा गाधी कहते हैं।
उन्होंने एक सच्चे जन नायक की भांती सदैव आदिवासी लोगो तथा महिलाओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। शिक्षा व स्वास्थ्य के प्रति उनका दृष्टिकोण आधुनिक था। उन्होने शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया आज उनके परिवार का शिक्षित वर्ग में गणना होता है।
ग्राम में उनके द्वारा 6 एकड (छ: एकड) जमीन विद्यालय को दान किया जिस पर वर्तमान में पूर्व मा. शाला, उच्चतर मा. विद्यालय व प्री-मैट्रिक छात्रवास संचालित है। जिसका नाम करण हेतु परिवार के अथक प्रयास से शासन द्वारा सत्र 2007-08 में बीर मांझी शासकीस उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भीरागांव रखा गया है।

क्षेत्र के विकास में योगदान


बीरा मांझी ग्राम के पटेल होने के कारण उनका स्वभाव मिलनसार, न्यायप्रिय व निर्मिक थे। समान में या ग्राम में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर उनके द्वारा सहज ही निराकरण कर न्याय दिया जाता था। कहते है कि स्वतंत्रता के बाद उनके संबंध बस्तर राज परिवार के महाराजा
प्रवीरचंद भंजदेव व कांकेर राजपरिवार के महाराजा भानुप्रतापदेव के साथ मधुर
संबंध थे। समय-समय प्रवास भी होता था ।
उनके पुत्र चरण सिंह माझी का चयन डिप्टी कलेक्टर में हुआ परन्तु ग्राम के पटेल व सम्पन्न कृषक होने के कारण वे प्रशासनिक क्षेत्र में न जाकर समाज हित में कार्य करना पसंद किया ।
आसपास के ग्रामों में धार्मिक कार्य हो या समाज उत्थान का कार्य, मांझी का सराहनीय योगदान रहता था। शासन प्रशासन में अच्छी पकड़ होने के कारण क्षेत्र को विकास की धारा में जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पक्षाघात के शिकार हुये


कार्य की अधिकता के कारण वे पक्षाघात के शिकार हो गये। फलस्वरूप 01 नवंबर 1994 का भारत माता का यह सपूत चीरनिद्रा में ऐसा सोया कि फिर कभी नहीं उठा। आज जरूरत है ऐसे वीर सपूत की याद में स्मारक का निर्माण हो जिससे उनके वंशज को न्याय मिल सके।
वर्तमान में इनके वंशज ग्राम में निवासरत है और शासन के विभिन्न विभागों में सेवाए दे रहे है जिनसे सम्पर्क करने पर नम आंखों से बीरा दादा को याद करते: है और इस उम्मीद में है कि बीरा दादा के साथ देर सबरे ही सही शासन से न्याय मिलेगा। और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त होगा।

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