तीजा बरोबर आये ओ दाई… गीत से सर्वाधिक लोकप्रिय हुए कांतिकार्तिक

छत्तीसगढ़


मुकेश टिकरिहा
रायपुर। वैसे तो गायन के क्षेत्र में कई कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन कांतिकार्तिक एक ऐसा नाम है जिसने महज कम समय में ही श्रोताओं के मध्य अपना विशेष स्थान बनाया है। राजनांदगांव के युवा कांतिकार्तिक जसगीत व लोकगीत के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इनके द्वारा गाए गए गीतों को सुनकर श्रोता कभी भक्ति के सागर में गोते लगाते है, तो कभी अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं। तीजा बरोबर आये ओ दाई गीत के गीतकार कांतिकार्तिक स्वयं है। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर, युवा व बुजुर्ग भी इनके गीतों को आनंदविभोर होकर सुनते हैं। शासकीय सेवा से वक्त निकालकर कांतिकार्तिक कलाक्षेत्र में अपनी साधना को आगे बढ़ा रहे हैं। कांतिकार्तिक ने व्यस्त दिनचर्या के बीच न्यूज 27 के लिए कुछ वक्त निकाले व चर्चा भी की। इस दौरान सवाल-जवाब का क्रम भी जारी रहा जो इस प्रकार है:-
प्रश्न- कांतिकार्तिक जी …आप गायन के क्षेत्र में कब से हैं तथा आप इस क्षेत्र में कैसे आये ?
उत्तर- माँ-पिताजी बताते है कि मैं लगभग 3 साल की उम्र से ही गायन कर रहा हूँ, बचपन में मैं गीतों को अपनी धुन में गाता रहता था। माता-पिता ने कभी किसी भी क्षेत्र में बढऩे से रोका नहीं, बस यह हिदायत देते थे कि इन सब का प्रभाव पढ़ाई पर न पड़े, इसलिए मैं मन लगाकर पढ़ाई कर खुद को मेधावी विद्यार्थी की श्रेणी में रखता था और ऐसा करने से मुझे यह लाभ मिला कि किसी ने भी मुझे गायन या अन्य रूचिकर कार्यों को करने से नही रोका। जस विधा के क्षेत्र में मैं माता रानी की कृपा से ही आया हूँ क्यूंकि मुझे याद है, एक गीत को मैंने और मित्र ओ.पी. देवांगन ने बनाकर यूं ही यूट्युब पर अपलोड कर दिया था। 2 साल बाद वह गीत अचानक वायरल हुआ, उस वक्त तक मैं अपने जॉब में व्यस्त था। इसके बाद हमें रायपुर से ऑफर आया कि एल्बम तैयार करते हैं। इसके बाद हमने पीछे मुड़कर नहीं देखा, श्रोताओं व दर्शकों के स्नेह व प्रोत्साहन के कारण लगातार छत्तीसगढ़ी बोली को बढ़ावा देने का कार्य कोक क्रियेशन द्वारा किया जा रहा हैं। इस प्रकार कांतिकार्तिक, ओपी देवांगन व केदार यादव द्वारा बनाई गई कोक क्रियेशन टीम के माध्यम से हम अपनी कला-संस्कृति की छटा पूरी दुनियां में बिखेर रहे हैं।
प्रश्न:-आपके प्रेरणास्त्रोत कौन हैं ?
उत्तर:-मेरी प्रेरणास्त्रोत मेरी माँ है, उनका साथ मुझे गाते गुनगुनाते और जीवन के अन्य सभी कार्यों को समझ बूझकर करने में या यूं कहूं कि जीवन को कैसे संतुलित रूप से जीया जाता है और अपनी माटी अपनी संस्कृति का मान कैसे रखा जाता है, यह मैनें उनसे ही सीखा है। पिताजी से विविध कौशल को कैसे निखारकर बहुद्देशीय बनना है, यह सीखा। मामा जी से ताल की समझ सीखी है। लोकगीत मन का सीधा उद्गार होता है इसलिए अन्य गीतों की अपेक्षा अपने माटी के गीतों को गाना और उसकी सेवा करना मैंने अपना ध्येय बनाया है।
प्रश्न:- आपने शायद राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त किया है, यह किस क्षेत्र में प्राप्त किया है ?
उत्तर:-हाँ, मैंने राष्ट्रीय सेवा योजना के अंतर्गत महामहिम राष्ट्रपति से पुरस्कार प्राप्त किया है, इसके अलावा तीन बार अलग-अलग महामहिम राष्ट्रपतियों से व प्रधानमंत्री से राष्टपति भवन में विशेष मुलाकात का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ है। मैने राजपथ दिल्ली मुख्य परेड में भी अपनी सहभागिता दी है।
प्रश्न:-क्या आपने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी छ.ग. का प्रतिनिधित्व किया है ?
उत्तर:- हाँ, इंडिया-चाइना यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम के अंतर्गत मैंने चीन की राजधानी बीजिंग व अन्य स्थानों पर अपने छत्तीसगढ़ व देश का प्रतिनिधित्व किया है। यह एक कारण है कि अन्य राज्यों की संस्कृति की तरह मैं अपने छत्तीसगढ़ की संस्कृति को सुंदर पुष्पगुच्छ की तरह पूरी दुनियां में महकता देखना चाहता हूँ।
प्रश्न:-जसगीत या भक्तिगीतों में आपका रूझान अधिक होने का कोई विशेष कारण ?
उत्तर:- जीवन दर्शन या आध्यात्मिकता की ओर मेरा रूझान होश संभालने के बाद से ही प्रबल हो गया था, शायद यही एक कारण है कि मैं भावपूर्णता से जसगीतों या भक्तिगीतों को गा पा रहा हूँ। केवल गीतों को गा देना ही पर्याप्त नहीं होता, जसगीतों के चयन के दौरान मैं प्रयास करता हूँ कि मेरे गीत लोगों को तनावमुक्त कर परमानंद की प्राप्ति कराएं। इस कार्य हेतु गुरूदेव मौनीलाला जी, मित्र व संगीतकार ओपी देवांगन, विनोद कश्यप जी व श्रीमती श्रद्धा कश्यप का सहयोग लगातार मिल रहा है और हम एक टीम के रूप में अच्छा गीत-संगीत श्रोताओं तक पहुंचा पा रहे हैं।
(तो यह थी कांतिकार्तिक से न्यूज 27 की बातचीत)

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