नाटक समीक्षा: रास बिहारी

छत्तीसगढ़ मनोरंजन

नाट्य समीक्षा
नाटक – रास बिहारी
लेखक – अशोक मिश्र ( रा.न.वि.)
निर्देशक – पल्लवी शिल्पी
प्रस्तुति – कच्ची माटी रायपुर 28 जुलाई 2019

रायपुर। राजधानी के वीरांगना प्रेक्षागृह में नाटक “रास बिहारी” देखने के दौरान लगातार यह बात मेरे ज़हन में नाटक के समानांतर चल रही थी कि एक नाटक का पूरे ताम झाम के साथ मंच पर पहुचना किसी चमत्कार से कम नहीं होता है , और निर्देशक नाटक का खुदा होता है क्योकि वह भी मंच पर एक संसार की रचना करता है |

हर निर्देशक लगातार नये और पुराने नाटक पढता रहता है , वह हर नाटक को खेलने का निर्णय नहीं लेता लेकिन तभी उसके हाथ में एक ऐसा नाटक आ जाता है जिसमें दिलचस्प कथानक के साथ साथ खिलते दृश्य होते है , बजते शब्द होते है , आलेख में उड़ता हुआ अभिनय समाहित होता है , लाईट , सेट और वेशभूषा की परते लगातार खुलती जाती है | ऐसे नाटको को पढने के दौरान ही खेलने का निर्णय ले लिया जाता है क्योकि पढ़ रहे हर पृष्ठ के साथ साथ मंच के कोण तय हो जाते है , दृश्य तय हो जाते है , अभिनेता के अंदाज़ तय हो जाते है , लाईट और सेट की डिज़ाइन तय हो जाती है ….. क्यों तय हो जाती है ? इसलिये तय हो जाती है क्योकि लिखते समय इन सब को लेखक ने योजनाबद्ध तरीके से पटकथा में समाहित किया था | मंच की तकनीक को आलेख में समाहित करने की कला ही नाट्य लेखन को कथा लेखन से जुदा करती है | लिखने की तकनीक में यह तकनीक आना ही पटकथा लेखन है | बहुत से अच्छे कथाकार , नाटककार नहीं हो सके उसका कारण सिर्फ यही था कि वे लिखने की तकनीक में मंच की तकनीक को नहीं समझ सके | अशोक मिश्र ने बेहद सामान्य भाषा में असामान्य नाटक की रचना की है | शब्दों में दृश्यों को पिरो देने की अदभुद कारीगरी है नाटक रास बिहारी का लेखन | इसमें लेखक अशोक मिश्र ने वर्णमाला के हर अक्षर को अभिनेता बना दिया है | फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर एवं वेल्डन अब्बा के पटकथा लेखक अशोक मिश्र छत्तीसगढ़ के पहले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक है |
रास बिहारी जैसे नाटक जब अपनी भाषा और बोली , विषय और विचार ,रंग और ढंग , अनुभूति और अभिव्यक्ति , प्रकाश और संगीत , संवाद और अभिनय , मंच परिकल्पना , रूप सज्जा और वेशभूषा के साथ मंच पर अवतरित होते है तब मौजूद हर दर्शक यह बात पूरी तरह स्वीकार कर लेता है कि नाटक बस जादू की छड़ी घुमा देने से तैयार नहीं हो जाते है , इसकी तैयारी में तप और जप जैसा परिश्रम लगता है |

रास बिहारी जैसी सशक्त नाट्य आलेख पर निर्देशक पल्लवी शिल्पी ने जो निर्देशकीय ट्रीटमेंट किया है वह अदभुद है | नाटक की हर फ्रेम इस बात का अहसास कराती है कि पल्लवी एक शिल्पी है | यह एक पात्रीय नाटक है और एक पात्रीय नाटक में सब से महत्वपूर्ण होता है अभिनेता को दृश्य में दाखिल कराना और दृश्य में से और अधिक उर्जावान बनाकर बाहर निकालना | सेट , लाईट , ड्रेस , संगीत यह सब नाटक के बाहरी तत्व होते है और अभिनय नाटक का आंतरिक तत्व होता है | बाहरी तत्व के लिए आंतरिक नहीं होता , आंतरिक तत्व के लिए बाहरी तत्व होते है | बाहरी तत्व बाज़ार की वस्तु है लेकिन आंतरिक तत्व है अभिनय जो अभिनेता के अंदर से निकालना होता है यह बाज़ार में नहीं मिलता | पल्लवी की यह बात मायने रखती है कि उसने बाहरी तत्व के बजाये आंतरिक तत्व पर ज़्यादा भरोसा किया | नाटक के शिल्प प्रभावशाली है , ऐसे शिल्प वही गढ़ सकता है जो स्वयं शिल्पी हो | पल्लवी शिल्पी हालांकि पिछले कुछ वर्षो से लगातार नाटको से जुडी रही है लेकिन स्वतंत्र रूप से यह उनके निर्देशन की पहली प्रस्तुति थी और अपनी पहली ही प्रस्तुति में लेखक को आमंत्रित कर पल्लवी ने रंगमंच के प्रति अपनी गंभीरता का आभास करा दिया है और अपने पहले ही नाटक की सौ रूपये टिकट रख अपने तेवर भी बता दिए है | रायपुर रंगमंच में जो छै खानदान थे अब वो सात हो गए है |

नाटक के बाहरी और आंतरिक तमाम तत्व अंततः अभिनेता के माध्यम से ही प्रगट होते है | मंच पर अभिनेता बल्ब की तरह होता है | वायरिंग कितनी भी अच्छी हो लेकिन बल्ब ही फ्यूज़ हो तो फिर आप स्विच को आँन करने में कितनी भी ताकत लगा दो बल्ब जलने वाला नहीं है | साकेत ने संकेत दे दिया है कि वह रंगमंच को जगमगा देने वाला बल्ब है | बहुत दिनों बाद ऐसा नाटक देखा जिसमें अभिनेता की हुंकार सुनाई दी |

नाटक में से अभिनय निकाल दिया जाये तो यह एक ऐसी सिली हुई बोरी हो जाएगा जिसमें शब्द भरे हो |

रास बिहारी रेल्वे में टिकट चेकर है , डयूटी के दौरान घटने वाले मनोरंजक किस्से ही नाटक का कथानक है | यह प्रश्न करता कथानक नहीं बल्कि उत्तर देता हुआ आलेख है | यह नाटक सिर्फ कला का प्रदर्शन ही नहीं बल्कि सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह भी है | इसमें भ्रष्ट्राचार जैसे मुद्धे को आधार बनाया गया है | भ्रष्ट्राचार वह दीमक है जो किसी भी देश को खोखला कर देती है | रंगकर्म में जो सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह है उसे मै इस प्रकार कहना पसंद करुगा कि नाटक एक प्रकार की वाशिंग मशीन है जिससे हम मैले समाज को साफ़ करते है |
हर नाटक को मंच तक पहुचाने में निर्देशक के साथ एक अघोषित व्यक्ति भी होता है , यह अदृश्य व्यक्ति जो नेपथ्य के हर दृश्य में मौजूद होता है , प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है | रास बिहारी में वह व्यक्ति आचार्य रंजन मोंड़क थे ।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *