कुल्हाड़ीघाट के दरहों में मछलीपालन से संवरेगी विशेष पिछड़ी जनजातियों की जिन्दगी

छत्तीसगढ़

गरियाबंद ।जिले के ग्राम कुल्हाड़ीघाट में अब विशेष पिछड़ी कमार जनजाति के लोग मछलीपालन से अपनी जिन्दगी संवारेंगे। वे अपने परंपरागत व्यवसाय बांसशिल्प के अलावा मछलीपालन के जरिए अपनी आजीविका को सुदृढ़ कर सकेंगे। यह पहली बार है जब कुल्हाड़ीघाट में मछलीपालन के लिए कमार जनजातियों को तालाब लीज में दिया गया है। 
जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में कुल्हाड़ीघाट एवं उसके आश्रित ग्राम भाताडिग्गी, कठवा, गवरमुंड व बेसराझर के 24 विशेष पिछड़ी जनजाति कमारों द्वारा मत्स्य सहकारी समिति का पंजीयन किया गया है। विगत दिनों समिति के साथ मछलीपालन विभाग द्वारा अनुबंध भी निष्पादित किया गया। अनुबंध के तहत कुल्हाड़ीघाट के बूढ़ाराजा नदी, गरहाडिग्गी दरहा गवरमुंड के गाड़ाघाट व चिकलादरहा बेसराझर के चेचंगीदरहा, नागरसील दरहा, लाम्बी दरहा (बड़ा व छोटा) इस तरह आठ दरहों में लगभग 80 हेक्टेयर रकबा का चयन किया गया है। 
विभागीय अधिकारी ने बताया कि समिति को इन दरहों में मछलीपालन के लिए दस वर्षीय पट्टा लीज में आबंटित किया गया है। प्रारंभिक तौर पर समिति के दस सदस्यों को दस दिवसीय मछलीपालन का प्रशिक्षण भी दिया गया है। प्रशिक्षण में सघन मत्स्य पालन, मछलियों में होने वाली बीमारियां परिपूरक का आहार का उपयोग तथा जाल बुनने के संबंध में  प्रशिक्षित किया गया है। समिति को शासन द्वारा दिये जाने वाले अनुदान योजना के तहत एक लाख रूपये का जाल और फुटकर मत्स्य विक्रय योजना के तहत एक आईस बॉक्स भी प्रदान किया गया है। प्रशासन के इस पहल से अब कुल्हाड़ीघाट के कमार जनजाति अपने परंपरागत व्यवसाय के साथ-साथ मछलीपालन को भी अपने आजीविका का एक मुख्य साधन बना सकेंगे। इससे निश्चित रूप से उनकी आय बढ़ेगी और जिन्दगी संवरेगी।

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