तीजा विशेष: हरितालिका व्रत कथा

छत्तीसगढ़ धर्म

कथावाचक ।पंडित पवन पुरोहित,राजिमवाले

भारत के उत्तर में हिमवान पर्वत स्थित हैं। हिमवान की पुत्री पार्वती ने अनेक वर्षो तक कठोर व्रत किया। शिव प्राप्ति के लिए पार्वती अपनी इच्छा पूर्व से ही अपने पिता को बतला चुकी थीं।लेकिन पिता को यह संबंध स्वीकार नहीं था।पार्वती को शिव प्राप्ति के लिए अनेक कठोर नियमों का पालन करते देख हिमवान का बड़ा दुखी होता। मन में सोचने लगता अपनी इस प्यारी कन्या को किसको दू।उसी समय नारद जी आकाश मार्ग से हिमवान के पास पधारें।नारद जी ने कहा भगवान विष्णु आपकी कन्या का हाथ अपने लिए मांग रहे हैं। श्री विष्णु आपकी कन्या के लिए पूर्णता योग्य हैं।हिमवान ने नारद जी से कहा जब स्वय भगवान विष्णु मेरी कन्या से विवाह करना चाहते हैं तो मेरे को भी यह रिश्ता मंजूर हैं। फिर तपस्यारत अपनी कन्या से कहा पुत्री मैंने तुमको श्री विष्णु  को दे डाला हैं। यह सुनकर पार्वती दुखी होती हैं। उसकी सहेली उसको सांत्वना देती हैं कि हम लोग घने जंगल में जाकर शिव आराधना करेंगे। और दोनों गहन वन में गुफा में नदी किनारे आश्रय लिया।हरित याने हरण की गई, हलिका याने सखी द्वारा। इसलिए इस व्रत का हरितालिका नाम पड़ा।वहीं दोनों रहकर शिव आराधना करने लगे। इधर हिमवान बहुत दुखी हुवे और जंगल,जंगल अपनी पुत्री को खोज करने लगे।भाद्र मास शुक्ल पक्ष का हस्त युक्त तृतीय तिथि को पार्वती में शिव को बालूकामयी प्रतिमा बनाकर विधिवत पूजन किया और निराहार रही। इस व्रत को करने से शिव जी का सिंहासन डोल गया।फिर उस स्थान पर शिवजी स्वयं पधारें, पार्वती से वरदान मांगने कहा। पार्वती बोली मेरे देव मुझे अपनी पत्नी स्वीकारें। शिव जी ने उन्हें तथास्तु कहा। खोजते खोजते हिरवान वहां आ पंहुचे।दो कन्याएं बालुकामयी मूर्ति को नदी में विसर्जित कर रहीं थीं।अपनी कन्या को प्राप्त कर वे बहुत प्रसन्न हुवे। शिव के वरदान के बारे में भी ज्ञात हुवा। पार्वती को घर ले आये एवं धूमधाम से शिव पार्वती का व्याह करा दिया।इस व्रत के प्रभाव से पार्वती ने शिव का आधा आसन प्राप्त किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *