बप्पाउत्सव विशेष:श्री गणेश कथा

छत्तीसगढ़

कथावाचक ।प.पवन पौराणिक राजिमवाले

कैलाश पर्वत के बीच स्न्नानागार में माता पार्वती स्नान कर रही थीं। अपने तन के मैल से उन्होंने एक बालक के पुतले का निर्माण कर प्राण फूंका। माता ने बालक को आदेश दिया कि यह दंड लो और स्न्नानागार के बाहर चौकसी करो।उन्होंने पुत्र को स्न्नान की बात कही और किसी को अंदर आने के लिये मना किया । इसी चौकसी के दौरान महादेव पधारे व अंदर जाने लगे। बालक ने उन्हें रोका । अंदर जाने के विषय में ही अधिक विवाद हुवा। महादेव ने देखा बालक उदंड है वो चले गये।फिर शिव गणों भी बालक से हारकर चले गये। यह समाचार सुुुनकर महादेव जी भ्रमित हुवे और त्रिशूल लेकर

स्न्नानागार की तरफ गये। तब देवता भी प्रकट हो गये। उन्होंने भी बालक को समझाने का प्रयास किया। बालक हट में अडिग रहा।अंत में महादेव क्रोधित होकर बालक पर त्रि शूल से प्रहार किया। बालक का मस्तक शरीर से अलग हो गया। पश्चात माता स्न्नान कर स्न्नानागार से आ चुकी थीं। बालक का मृत शरीर देखा और रुदन करने लगी। वह भी क्रोधित होकर कही ,मेरे शरीर के मैल से मेरे बनाये पुत्र का वध किसने किया। इसके बाद उपस्थित सभी निरुत्तर हो गये। महादेव ने कहा अनजाने में मेरे द्वारा यह भूल हुवी। उन्होंने अपने गणों से कहा कि जो जीव दक्षिण दिशा की और पैर करके सो रहा हो ,उसका मस्तक काटकर ले आवो। आदेश का पालन करते हुवे दक्षिण की और प्रस्थान किये।इसी ओर पैर करके एक हाथी का बच्चा सो रहा था। गणों ने उसका मस्तक काटकर महादेव को सौप दिया। महादेव ने बालक के धड़ में मस्तक को जोड़कर पुनः जीवित कर पार्वती के क्रोध कम कर दिया। पुत्र का नाम गणेश रखा गया। देवतावो ने बालक को आशिर्वाद और शक्तियों प्रदान कर प्रथम पूजा के अधिकारी बना दिया। तब से किसी भी शुभ कार्य मे श्री गणेश की पूजा होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *