मां महामाया देवी की पढ़िए पुरी कहानी

धर्म

रायपुर . पुरानी बस्ती स्थित मां महामाया देवी मंदिर की स्थापना हैहयवंशी राजा मोर ध्वज ने तांत्रिक विधि से कराया था . यह देश का एक मात्र मंदिर है जिस परिसर में दो भैरव जी के मंदिर बने हैं . इस मंदिर के बारे प्राचीन कहानी है। कहानी के अनुसार राजा मोर ध्वज क्षेत्र में प्रजा का हालचाल जानने भ्रमण पर निकले थे. उनके दल भ्रमण में रानी बच्चे निज सहायक से पहरेदार रानियां दासिया और कुल पुरोहित भी थे. भ्रमण में शाम ढलने के बाद राजा ने नदी किनारे अपना डेरा जमाया. जो वर्तमान में खारून नदी है . यह उस समय बीहड़ जंगल था. रात्रि में विश्राम किये . प्रातकाल होते ही रानी दसियों साथियों के साथ स्नान करने नदी गई. उन्होंने देखा एक बहुत बड़ा विशाल पत्थर नदी किनारे है. तीन बड़े पत्थर में सांप मस्त आनंदित फन फैलाए बैठे हुए थे. यह देख कर रानी व दासिया भयभीत हो गई. और वहीं से बिन नहाये वापस चली गई. जब रानी ने राजा को यह बात बताई तो राजा कुल पुरोहितों को लेकर उस जगह पर गये . कुलगुरु पुरोहितों ने ध्यान लगाकर देखा पूजा आराधना करने के बाद पत्थर से आवाज आयी मैं तुम्हारी कुलदेवी हूं मुझे कहीं पर प्रतिष्ठित करो, मुझे कंधे पर ही उठाके लेना, लेते समय किसी बीच में उतारा नहीं जिस जगह उतारो गे वही स्थापित हो जाऊंगी. उस समय मंदिर का निर्माण चल रहा था परंतु यह तय नहीं था मंदिर पर कौन विराजेगा . राजा ने प्रतिमा को नवनिर्मित मंदिर में ले आये. चौरा में प्रतिमा को बैठाते नही बना तो राजा ने प्रतिमा को पत्थर के किनारे बैठा दिया. फिर राजा ने प्रतिमा को चौरा में बैठाने की कोशिश करने बाद नाकाम रहे. इस वजह से चौखट से मां की मूर्ति तिरछी दिखाई देती है.

राखिया बलि दी जाती है :मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला ने बताया मंदिर की पूजा पद्धति प्राचीन परंपरा से जुड़ी है. यहां 1960 से बलि प्रथा बंद कर दी गई है इसकी जगह राखिया बलि दी जाती है.

माता रानी की आस्था विदेशों तक. माता रानी की आस्था भारत के अलवा अमेरिका, लंदन चीन आदि देशों तक है. नवरात्री के एक महीना बीत जाने के बाद फिर दीप प्रज्वलित करने के लिए बुकिंग शुरू हो जाती है. इस बार माता रानी के दरबार में 11000 दीपक प्रज्वलित किये गये है.

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